मालूम न हुआ कब हुए जवां हम ||
पार कर गए बचपन की आस्तां हम ||
तब भी वालिदा को लगे तिफ्ल ही ,
करके तरक्की छू लें आसमां हम ||
अब ना है कुछ छिपाने की जरूरत ,
जब हो गए हैं तेरे राजदां हम ||
उनसे दूर है तो क्या हुआ फिर ,
उनको आज भी भूले हैं कहाँ हम ||
गुजरें है "नजील" उनकी गली से ,
अक्सर देकर इश्क का इम्तिहां हम ||
पार कर गए बचपन की आस्तां हम ||
तब भी वालिदा को लगे तिफ्ल ही ,
करके तरक्की छू लें आसमां हम ||
अब ना है कुछ छिपाने की जरूरत ,
जब हो गए हैं तेरे राजदां हम ||
उनसे दूर है तो क्या हुआ फिर ,
उनको आज भी भूले हैं कहाँ हम ||
गुजरें है "नजील" उनकी गली से ,
अक्सर देकर इश्क का इम्तिहां हम ||

बहुत उम्दा!
ReplyDeleteधन्यवाद आदरनीय डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) जी हार्दिक आभार ..:)
Deletebahut hi behtarin.....
ReplyDeleteधन्यवाद आदरणीया रीना मौर्या जी हार्दिक आभार ..:)
Deleteकहता है क्या अच्छी ग़ज़ल .बहुत अच्छे ज़नाब .क्या बात है
ReplyDeleteधन्यवाद आदरणीय वीरू भाई जी हार्दिक आभार ..:)
Deleteआपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
ReplyDeleteकृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.com
चर्चा मंच-791:चर्चाकार-दिलबाग विर्क
धन्यवाद आदरणीय दिलबाग जी हार्दिक आभार ..:)
Deleteअच्छी ग़ज़ल कहता है क्या .........
ReplyDeleteऔर कहते रहिये ....
सुनने वाले तैयार हैं.....
thanks alot
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